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Thursday, February 10, 2011

दिलरुबा

हल्की सी मुस्कान लबो पे छा जाती है.
ऐ  दिलरुबा  जब-जब तेरी याद आती है

खुश नहीं है तू भी जुदा होकर मुझसे 
ये नम हवा दास्तान-ए-अश्क सुना जाती है

धड़क उठता है फिर से बेजान दिल
चौखट पर कदमो की आवाज़ गर आ जाती है

होगा कैसा आज मिजाज़ तुम्हारा 
मौसम की अदाए ये बता जाती है


बहुत बोलती है खामोश निगाहे तेरी
झुक कर मजबूरियाँ सारी समझा जाती है


वो बच्चो सी दिलकश बेबाक हसी
रोती आँखों में भी गुद- गुदा जाती है


जरुर बना होगा हमारे भी मिलने का एक दिन
बस यही आरज़ू जीने की ख्वाहिश बढा जाती है.
विवेक...



Thursday, January 6, 2011

दोस्ती.... Vivek

तेरी दोस्ती सदा इस दील में जवान रहेगी.
मुस्कुराते लब नमी आँखों में इसकी पहचान रहेगी  


इतना बता दे था फ़रिश्ता, या खुद खुदा तू .
कब तक तेरी सख्सियत से मेरी हस्ती अंजान रहेगी .


हर बदी  से बचाता रहा हरदम मुझे.
आखरी सांस तक तेरी यादे दील में मेहमान रहेगी.


फैलाकर नूर हो गया दूर तू हमसे .
खुशकिस्मत वो खुदाई है जो तेरी मेज़बान रहेगी.


गर पूछे कोई मुझसे "क्या है दोस्ती .? "
ज़िक्र-ए-यारी तेरी सदा हम-ज़ुबान रहेगी 

Thursday, December 23, 2010

इक बार गर आ जाओ ---vivek

सुखी डाली पर हरी बेल की तरह छा जाओ
सवर जाएगी ज़िन्दगी इक बार गर आ जाओ 


ना होगी ख्वाहिश कभी अमृत की मुझे  
दो घूट आँखों से अगर पिला जाओ


पिघल जाएगी  मेरी रूह तेरी आगोश  में 
गर्म बाँहों के दायरे में इक बार समां जाओ


सख्त जान हु ऐसे न टूटेगा हौसला मेरा
दो - चार ख्वाब नज़रो  को  और दिखा जाओ


लड़ सकता हु तेरी खातिर सारी दुनिया से भी मै
इक बार जो कहती तुम हद से गुज़र जाओ


 'विवेक 'से इस जनम में बिछड़ना  ही है अगर.
फिरर तन्हा  जीने की एक वज़ह तो बतला जाओ ...