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Sunday, August 14, 2011

उलझन......

तेरे ख्यालो से जिस दिन मै नीजात पाउ
तेरे सिवा तब मै कुछ और भी लिख पाउ

अपनी उलझनों से ही नहीं मिलती है आजादी 
दोस्तों  मै क्या किसी रोते को समझाऊ 

 मेरे कानो में हरदम गूंजती है तेरी आवाज़े
समझाने वालो माफ़ करना, गर कुछ न सुन पाउ

तुझ बिन जीने की बात से ही खौफ लगता है..
अगर ऐसा हुआ तो मुझको दर है मै न मर जाऊ...

 किसी सहरा के प्यासे को एक कतरा ही काफी है
 तेरी एक दीद से बढ़कर बता मै और क्या चाहू..

Monday, April 11, 2011

हंसती आँखों में ग़म नहीं होते.. shilpi


कैसे कहें  तुझे  याद  कर  हम  नहीं  रोते 
आँखों के कोने  आंसुओं  से  नाम  नहीं  होते…

हर बार  जो  हंसकर  मैं  ताल  जाती  हूँ बातें 
न  समझना  हंसती  आँखों  में  ग़म  नहीं  होते..

तेरे ख्यालों में खोये रहना, घुटना तेरी यादों में...
क्यूँ मेरी  बज़्म  में  प्यार  के  मौसम  नहीं  होते..

ख़ामोशी  अब  भी  गूंजती  है , तन्हाई  तडपती  है 
एक तेरी  ही  यादों  में  कभी  हम  नहीं  होते…

ना  मुस्कुराते यूँ  ही  जो  तुम  देखकर  मुझे 
यूँ  पागल  तेरे  इश्क  में  फिर  हम दम नहीं  होते…

बेशक  सलीका  नहीं  मुझे  लिखने  का  गज़लें 
ना  लिखते  गर  दिल  में  मातम  नहीं  होते…

---- शिल्पी 

Thursday, February 10, 2011

दिलरुबा

हल्की सी मुस्कान लबो पे छा जाती है.
ऐ  दिलरुबा  जब-जब तेरी याद आती है

खुश नहीं है तू भी जुदा होकर मुझसे 
ये नम हवा दास्तान-ए-अश्क सुना जाती है

धड़क उठता है फिर से बेजान दिल
चौखट पर कदमो की आवाज़ गर आ जाती है

होगा कैसा आज मिजाज़ तुम्हारा 
मौसम की अदाए ये बता जाती है


बहुत बोलती है खामोश निगाहे तेरी
झुक कर मजबूरियाँ सारी समझा जाती है


वो बच्चो सी दिलकश बेबाक हसी
रोती आँखों में भी गुद- गुदा जाती है


जरुर बना होगा हमारे भी मिलने का एक दिन
बस यही आरज़ू जीने की ख्वाहिश बढा जाती है.
विवेक...